21 October 2010

डे ११, ऑफिस, जबलपुर (मध्य प्रदेश)

नमस्ते, गुड इवेनिंग, आदाब, सत श्री आकाल... यारों सुनाओ कैसे हैं आपके हाल... दोस्तों आज बहुत समय बाद अपने ब्लॉग पे आना हो पाया... अब रोज़ लिखा करूंगा... और खूब लिखा करूँगा... एक नयी शुरुआत एक कविता से करते हैं, जो हमने लिखी है :

वो लड़की है
या
इश्वर की बनाई इक सुन्दर कृति
जिसकी झील सी आँखें हैं
जिसके होंठ गुलाब की पंखुड़ियां
बाल हैं काली घटाओं से भी घने
जब मुस्कुराती है
ऐसा लगता है मानो बाग़ में
हज़ारों फूल खिल गए
एक लड़का है
जो उससे प्रेम करता है
पवित्र निश्छल प्रेम
मगर वो लड़की यही समझती रही
वो भी है औरों जैसा
औरों जैसा ?
उसके जिस्म से प्यार करने वाला
क्या ऐसा हो सकता है
जो उससे निश्छल प्रेम करता है
वो वाकई ऐसा हो सकता है
नहीं कतई नहीं
मगर उस लड़के की भी प्रेम की परिभाषा ही
कुछ और है
वो कहता है
प्यार वो नहीं
जिसे पा लिया जाये
प्यार तो वो है जिसके लिए
सदा दिल में एक कसक सी रहे
क्योंकि अगर शादी के लिए ही प्यार होता है
तो प्यार होना ही नहीं चाहिए...

आपको ये कविता कैसी लगी, मुझे बताईयेगा ज़रूर... अपनी प्रतिक्रियाएं इस ब्लॉग पर या फिर facebook और orkut पे भी दे सकते हैं... facebook और orkut पे सर्च करें - VICKY TIWARI

हम हैं राही प्यार के... फिर मिलेंगे... चलते चलते...

2 comments:

  1. ufffff.....pata nahi ye fever kab utrega...kya kuch naya sunne ko milega....??????ya phir suspence me hi jina padega...???

    ReplyDelete
  2. शानदार पेशकश।

    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
    सम्पादक-प्रेसपालिका (जयपुर से प्रकाशित हिंदी पाक्षिक)एवं
    राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
    0141-2222225 (सायं 7 सम 8 बजे)
    098285-02666

    ReplyDelete