24 March 2011

Day 39, Home, Jabalpur (M.P.)

दोस्तों, मेरी अगली प्रेम कविता का शीर्षक है - वो नीला पुलोवर... इसे हमने आज (24/03/2011) ही लिखा है...

वो नीला पुलोवर

वो नीला पुलोवर
लाल बैगनी चकत्तेदार
जिसे पहन तुम 
लग रही हो
मोरनी
जो हो
मेरे मन मंदिर
मैं नाचने को तैयार    
तुम्हारे
नाज़ुक पैरों की
थिरकन से
खिल उठा
पुलकित हुआ
रोम रोम मेरा
तुम्हारी
हंसी की खनक
तुम्हारे
अनकहे शब्दों के
स्पंदन से
झनका दिए हैं
तुमने
मेरे तन - मन के
तार तार
मेरा तन - मन
जो पहले था
तुम पर फ़िदा
अब हो गया है
तुम्हीं पर आसक्त
तुम्हारी आँखों के
ये प्रेम प्याले
जो छलकाते जाते 
प्रेमिल मदिरा
करती जो
मदहोश
दिन रात
करती  विवश
लिखने को
एक कविता
समेटे हो
उदगार विचार
तुम्हारे पास का
वो नीला पुलोवर
लाल बैगनी चकत्तेदार
अब है
तुम्हारा ही हिस्सा
कोई और जो पहनेगा
तो लगेगा
दूसरा ही
मत करना
तुम
इसे अपने से अलग
यूँ ही
नाचती गाती
इठलाती फुदकती
रहना तुम
मेरे मन मंदिर में
रखना इस
गुल गुलशन को
हरा भरा
रह जाए ताकि
हरियाली यहाँ
तुम्हारे लिए
ओ! नीले पुलोवर वाली
आना ज़रूर
कर रहा
इंतज़ार
ये मयूर
तुम्हारा...

ll विकी तिवारी ll

तुम्हारा, तुम्हारा ही तो

विकी तिवारी 

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