दोस्तों... मेरी अगली कविता मेरे मन की व्यथा कथा पे आधारित है... इसे मैंने ०८/०३/२०११ को लिखा है... इसका शीर्षक है - मैं कमज़ोर हूँ...!?
मैं कमज़ोर हूँ...!?
मैं कमज़ोर हूँ..!?
क्यूँ ?
मैंने
ऐसा क्या
कर दिया
या
कह दिया
कि
कमज़ोर
करार
कर दिया गया
अच्छा...
मैं कमज़ोर
शायद इसलिए हूँ
कि
मैं
अपने मन
में आने वाली बातों को
किसी से कर लेता हूँ
डिस्कस
किसी से कर लेता हूँ
शेअर
यारों
दोस्तों
मित्रों
शुभचिंतकों
मुझे एक बात बताओ
समझाओ ये बात मुझे
की
कुकर के फट जाने से
अच्छा क्या है ?
उसका सीटी मरते रहना
है न...
पंखे से लटक जाने
पहाड़ से कूद जाने
या
पटरी पर लेट जाने
से अच्छा क्या है
किसी अपने से
अपना दिल हल्का
कर लेना
है न
तो फिर मैं
कमज़ोर
कहाँ से हुआ
चुनांचे
यदि मैं भी
अपनी तथाकथित
बहादुरी
का परिचय देते हुए
अपनी रगों मैं बहते
खून के हर एक
कतरे को
नसों से कर दूँ
आज़ाद
तब फिर शायद
इस सभ्य दुनिया
की नज़र में
मैं
एक
सम्मानजनक
स्थान पा सकूँ
लेकिन नहीं
तब भी
मैं
अपनी उस
'आयतित उपाधि'
से पा सकूँगा न
छुटकारा
इसलिए
मैं मानता हूँ
मेरे लिए
बेहतर यही है
की
मैं वैसा ही रहूँ
जैसा हूँ
और
मैं इतना जनता हूँ
की
मैं गलत नहीं हूँ
फिर चाहे मैं
कैसा भी हूँ
मैं
मैं हूँ
वो
शायद सही हो सकते हैं
पर
पता नहीं क्यूँ
वो
6 और ९
के विज्ञान को
क्योंकर
भूल जाते हैं...
ll विकी तिवारी ll
आपका, आपका ही तो
विकी तिवारी
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