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14 March 2011

Day 36, Home, Jabalpur (M.P.)

दोस्तों... मेरी अगली कविता मेरे मन की व्यथा कथा पे आधारित है... इसे मैंने ०८/०३/२०११ को लिखा है... इसका शीर्षक है - मैं कमज़ोर हूँ...!?

मैं कमज़ोर हूँ...!?

मैं कमज़ोर हूँ..!?
क्यूँ ?
मैंने
ऐसा क्या
कर दिया
या 
कह दिया
कि
कमज़ोर
करार
कर दिया गया
अच्छा...
मैं कमज़ोर
शायद इसलिए हूँ
कि
मैं
अपने मन
में आने वाली बातों को
किसी से कर लेता हूँ
डिस्कस
किसी से कर लेता हूँ
शेअर 
यारों
दोस्तों
मित्रों
शुभचिंतकों
मुझे एक बात बताओ
समझाओ ये बात मुझे
की
कुकर के फट जाने से
अच्छा क्या है ?
उसका सीटी मरते रहना
है न...
पंखे से लटक जाने
पहाड़ से कूद जाने
या
पटरी पर लेट जाने
से अच्छा क्या है
किसी अपने से
अपना दिल हल्का
कर लेना
है न
तो फिर मैं
कमज़ोर
कहाँ से हुआ
चुनांचे
यदि मैं भी
अपनी तथाकथित
बहादुरी
का परिचय देते हुए
अपनी रगों मैं बहते
खून के हर एक
कतरे को
नसों से कर दूँ
आज़ाद
तब फिर शायद
इस सभ्य दुनिया
की नज़र में
मैं
एक
सम्मानजनक
स्थान पा सकूँ
लेकिन नहीं
तब भी
मैं
अपनी उस
'आयतित उपाधि'
से पा सकूँगा न
छुटकारा
इसलिए
मैं मानता हूँ
मेरे लिए
बेहतर यही है
की
मैं वैसा ही रहूँ
जैसा हूँ
और
मैं इतना जनता हूँ
की
मैं गलत नहीं हूँ
फिर चाहे मैं
कैसा भी हूँ
मैं
मैं हूँ
वो
शायद सही हो सकते हैं
पर 
पता नहीं क्यूँ
वो
6 और ९
के विज्ञान को
क्योंकर
भूल जाते हैं...

ll विकी तिवारी ll

आपका, आपका ही तो

विकी तिवारी

07 February 2011

Day 27, Home, Jabalpur (M.P.)

~ Happy Rose Day Doston ~
दोस्तों, कल मैं अपने भैया से बात कर रहा था... उन्होंने मुझसे एक बहुत अच्छी बात कही, वो ये की तुम दूसरों के लेख की जगह अपने लेख लिखो, ज्यादा अच्छा रहेगा क्योंकि वो बात तुम्हारे दिल की होगी. मुझे उनकी ये बात बहुत अच्छी लगी और हम उसे मानेगे भी 14 onwards... तब तक यानी आज 7 से लेकर 13 तक आप दूसरों के लेख पढ़िए ताकि आप उनमें और मेरे लेखों में अपने सुझाव दे पायें कि हम कहाँ तक प्यार को समझ पाए हैं क्योंकि व्यक्ति जो भी लिखता है उसे अपनी लेखनी को और परिष्कृत करने के लिए आपने पाठकों की राय की बहुत ज़रुरत होती है -

मैं प्यार की वेदी पर चढ़ा दूंगी ये दुनिया 
'सखी चिंता कहते हैं किसे, सखी यातना कहते हैं किसे, तुम जो रटते रहते हो दिन-रात, प्यार-प्यार, सखी प्यार की परिभाषा क्या' रविंद्रनाथ टगोर के इस गाने में एक सहेली दूसरी सहेली से यही पूछती है की प्रेम की परिभाषा क्या है ? अब प्रेम की कोई एक परिभाषा हो तो बताएं. एक मायना हो तो समझ आये. जितना सरल शब्द है प्रेम, उतना ही मुश्किल है इसे समझना.
प्रेम सरेंडर है. अगर निजी बात करूँ तो प्रेम समर्पण है. अगर आप किसी से प्रेम करते हैं तो समर्पण का भाव खुद-ब-खुद आ जाता है. आप 'मैं' और 'अहम्' से ऊपर उठते हैं. त्याग स्थाई भाव बन जाता है. सब कुछ न्योछावर कर देना चाहते हैं उस शख्स पर, जो आपको निहायत अज़ीज़ है. जिसकी एक मुस्कराहट पर आप सारे गम भूल उसके साथ मुस्कुराने लगते हैं. जिसकी खनखनाती हंसी से आपका दिन खुशगवार हो जाता है. वो उदास हो तो आपका चेहरा भी स्याह पड़ जाता है. साथी की जो कमियां कभी आपको खलती थी, धीरे-धीरे वही उसका स्टाइल लगने लगती हैं.
प्रेम संघर्ष है. अनवरत. कभी ख़त्म न होने वाला संघर्ष, दो प्रेमी सात फेरे ले लें तो प्यार सफल मान लिया जाता है. कम-से-कम हिंदुस्तान में तो प्रेम की परिणिति शादी ही है. सोहनी-महिवाल, हीर-रांझा और लैला मजनू ने प्रेम किया, लेकिन वो इसे शादी के अंजाम तक न ला पाए. टीस रह गयी. इसलिए ये दुखांत है.
लिओ तोल्स्तोय मानते हैं की 'प्रेम ही जीवन है, मैं जो कुछ भी समझ पाता हूँ, उसकी वजह सिर्फ प्रेम ही है.'
अमेरिकी कवियत्री निकी जीओवानी अपनी एक कविता मैं कहती हैं -
खूबसूरत आमलेट लिखा मैंने
खाई एक गरम कविता
तुमसे प्रेम करने के बाद
गाडी के बटन लगाये
कोट चलाकर मैं
घर पहुंची बारिश मैं
तुमसे प्रेम करने के बाद
लाल बत्ती पर चलती रही
रुक गयी हरी होती ही
झूलती रही बीच मैं कहीं
यहाँ भी
वहां भी
तुमसे प्रेम करने के बाद
समेत लिया बिस्तर मैंने
बिछा लिए अपने बाल
कुछ तो गड़बड़ है
लेकिन मुझे नहीं परवाह
उतार कर रख दिए दांत
गाउन से किये गरारे
फिर खड़ी हुई मैं
और लिटा लिया खुद को
सोने के लिए
तुमसे प्रेम करने के बाद
पाब्लो नेरुदा के लिए प्रेम कभी न ख़त्म होने वाला भाव है, वो कहते हैं - 
अब मैं उसे प्यार नहीं करता हूँ
उसमें कोई शक नहीं
लेकिन शायद उसे प्यार करता हूँ
जर्मन कवि बर्तोल्त ब्रेकथ प्रेम को कमजोरी से आंकते हैं. ये बानगी देखिये -
कमजोरियां तुम्हारी कोई नहीं थी
मेरी एक थी, मैं करता था प्यार
भारत की एनी जैदी कहती हैं की -
प्रेमी करीब आना चाहे
बिलकुल करीब
तो गहरी साँस बनाकर थाम लो उसे
तब तक, जब तक टूट न जाओ

सभी रचनाओं में एक ही भाव है - प्रेम का भाव लेकिन फील सबका अलग अलग है. कहीं कहीं प्रेम सुरक्षा भी है. प्रेम देता है होंसला, प्रेम जनता है आपकी हिम्मत.

प्रेम स्वार्थ है. कहता है की जो हमारा है, वो हमारा होकर ही रहे जीवन भर. प्रेम सिखलाता है किसी पर अपना हक़ समझना. और कई दफा मजबूर कर देता है हर बात मानने के लिए. फूल की फरमाइश करें तो आपका साथी पूरा बगीचा उठा लाये, मन की किताब पढ़ ले. आँखों में झांकते ही दिल की बात समझ जाए. अपेक्षाएं बढ़ता है प्रेम. डिमांड पूरी होती रहे तो सब अच्छा. कमी आयी नहीं की प्रेम का परा नीचे उतरना शुरू. लेकिन स्वार्थ है भी तो क्या हुआ ? प्रेम तो है. मोहब्बत की बयार बहती रहे तो खुदगर्जी की धूल धीरे-धीरे उड़ जाएगी. स्वार्थ इतना हावी न हो जाए की प्रेम बंधन लगने लगे.
प्रेम वासना है. प्रेम शरीरी है. कहते हैं प्रेम की गहराई मैं कहीं-न-कहीं शारीरिक घनिष्टता छिपी है. कहते हैं दो शरीरों का मिलन आत्माओं का मिलन होता है. कहते हैं अन्तरंग होकर एक-दूसरे से कंनेक्ट हुआ जा सकता है. एक-दूसरे के प्रति गूढ़ प्रेम को महसूस किया जा सकता है. प्रेम के पलों में नीरस से नीरस व्यक्ति भावुक हो उठता है. शायद इसीलिए सम्भोग को प्रेम की पराकाष्ठा मानते हैं. वहीँ एक प्लेटोनिक प्रेम भी है. आउट ऑफ़ द वर्ल्ड. कोई चाह नहीं. कोई कंडीशन नहीं. मन से मन का रिश्ता. दिल से दिल को राह. बिना तार का कर्रेंट है प्लेटोनिक प्रेम.
प्रेम को लेकर भ्रान्ति है. कहते हैं की एक बार प्यार हो जाए तो ता उम्र रहता है. मेरा मानना है की प्यार जन्म लेता है, प्यार जवान होता है, प्यार भूढ़ा होता है और फिर प्यार मरता भी है, लेकिन हाँ, प्यार में मर-मर कर जिंदा होने की ताक़त है. प्यार जो खुद को मुक्त करता है फिर प्यार करने के लिए. प्यार के भी अपने मौसम हैं.
लब्बोलुआब ये की प्यार को किसी परिभाषा में बंधना मुशकिल है, बेमानी भी. प्यार तो सिर्फ प्यार है. एक दरिया है बहता हुआ, निरंतर. इसके बहने में ही इसकी सुन्दरता है. इसके बहने में ही प्राण हैं. इसके बहने में ही जीवन है. हमारा होना ही इस बात का सबूत है की प्यार है. हमारा साँस लेना ही प्यार है. बस... यही तो है प्यार.
- माधवी शर्मा गुलेरी 


आपका, आपका ही तो
Vicky Tiwari

27 December 2010

Day 23, Home, Jabalpur (M.P.)

Date & Day - 25 / 12 / 2010, Saturday...
Place - Dad's Office...
Time - 3:30 to 05:00 PM...


आज (25/12/2010) पापा के एक फ्रेंड आये थे... जिन्हें अपने काम धाम छोड़ कर दूसरें के लिए फ़िक्र करने का बहुत टाइम है... इसलिए लगे मेरी शादी के बारे में बुरा बुरा बोलने, अच्छा तो मैंने पापा के किसी फ्रेंड के मू से आज तक नहीं सुना... really... उनके हिसाब से दुनिया में अगर मेरी शादी न हुई तो वो भूके मर जायेंगे ऐसा लग रहा था उनके कहने से... खेर, उन्होंने अपनी ये बात किसी तरेह ख़त्म की तो एक नया टोपिक छेड़ दिया - पापा कि गाडी का... जो हमने फोर्सफुली दिलवाई है पापा को, सुजुकी एक्सेस... वो बोलने लगे पापा से कि - कुमार, ये तुमने गलत गाडी ले ली... स्कूटी लेना थी हलकी भी है और सस्ती भी... चलो भई, ये बात भी ख़त्म हुई तो फिर एक नया टोपिक छेड़ दिया कि हम और हमारे पापा कब तक रहते हैं ऑफिस में... तो पापा कहने लगे कि ये (यानि मैं) ६ बजे तक रहता है ऑफिस में, उसके बाद अपने दोस्तों के साथ बैठ जाता है...
इतनी देर कि बातचीत में मुझे ये चीज़ बहुत बुरी लगी, बहुत दिल दुख गया ये सुन कर कि आज भी THEATRE को लोगबाग अपनी बातचीत का हिस्सा ही नहीं मानते... पापा मेरी कुंडली शादी के लिए जब भी कहीं भेजते हैं, तो उसमें से वो theatre वाला पन्ना अलग कर लेते हैं जिसमें ये लिखा है की मैं theatre करता हूँ और इतने नाटक कर चुका हूँ, मेरी उपलब्धियों को दूसरों से छुपाते हैं वो... अगर किसी को पता चल जायेगा की मैं नाटक करता हूँ, theatre करता हूँ, ड्रामा करता हूँ तो क्या मेरी शादी नहीं होगी... नहीं होगी तो नहीं होगी... मुझे ज़रुरत भी नहीं ऐसे फ़िज़ूल के रिश्ते की जो मुझे मेरे सपने से अलग कर दे... लेकिन, ऐसा क्यों है... बुरा इसलिए भी लगा कि दोस्तों के साथ बैठने का एक और भी मतलब निकलता है - दारु पीता है अपने दोस्तों के साथ...
यारों... कम से कम MERA THEATRE शराब से तो कहीं ज्यादा अच्छा है ही... मुझे theatre में जीने का मकसद मिला है, मुझे theatre ने क्या दिया है, ये शायद मैं नहीं बता पाऊं क्योंकि शायद अभी तक ऐसे शब्द ही नहीं बने जो मेरी जुबां बोल सकें... मुझे आप सब कि हेल्प चाहिए... जब भी कभी आपके शहर में नाटक हों, उन्हें देखने ज़रूर जाएँ... please... मैं और मेरे साथी ये प्रूव करना चाहते हैं कि THEATRE से भी घर चलाया जा सकता है... बहुत से लोगों के घर तो चल भी रहे हैं... मैं तो यहाँ तक कहूँगा की THEATRE से ज्यादा मानसिक श्रम मांगनेवाला काम की है ही नहीं...


Jai Theatre  

05 December 2010

Day 18, Home, Jabalpur (M.P.)

Wo Gazal...


उसने
कागज़ को
होठों से दबाकर
जो फेंका तो
लिपिस्टिक ग़ज़ल हो गयी
और
मैंने उसे उठा कर
जो ज़हन से लगाया
तो वो
उम्र कि
सबसे बड़ी
धरोहर हो गयी
खुदा का फज़ल हो गयी
मीरा का भजन हो गयी
अब मेरी ज़िन्दगी
खुद एक ग़ज़ल हो गयी...


Vicky Tiwari


Thought for The Day : Aap agar har kaam faayede ke liye karte hain to yaad rakhiye aap ab tak kaee baar nuksaan utha chuke hain...


28 November 2010

Day 16, Home, Jabalpur (M.P.)

Badle Main...

हमने हमेशा से यही
सुना है
जो हम दुनिया को
देते हैं
वो हमे दुगना चौगुना होकर हमे
मिलता है
चाहे वो पैसा हो या इज्ज़त
हमे सब कुछ बढ़ चढ़ कर
वापस मिलता है
पर
ऐसा क्यूँ होता है
कि
जब हम
किसी को 
प्यार करते हैं
तो वो
बहुत होकर नहीं मिलता
आखिर क्यूँ...
है कोई जवाब ?

प्यार पे में मरूं
प्यार पे तुम भी मरो
फूल सा में झरूँ
फूल सी तुम भी झरो
एक वसीहत नस्ल - ए - कल के नाम लिख एहसास कि
दस्तखत एक तुम भी करो
दस्तखत एक में भी करूँ...

Click on the link given below to see me in my new play - Shining India...

Vicky Tiwari

24 October 2010

Day 14, Office, Jabalpur (M.P.)

NASHA - 2

रिन्दों से सुना है कि
जीवन में एक न एक
नशा ज़रूरी होता है
मैंने सोचा -
" क्या इसलिए इंसान का जन्म होता है "
खेर...
मुश्किलों से
हार कर
थक कर
टूट कर
जब
नशे का आदि हुआ
तो काफी अंतराल बाद
बन्दों ने मुझसे कहा -
" क्यों नशा करते हो,
क्या तुम अपने आप को
निराश हताश पाते हो "
तब उन्होंने परिभाषित किया
शराब बनाम नशे को
कि
अगर शराब पीने से
इंसान  को सहारा मिलता
उस क्षण
इसे पीने के बाद
इंसान लडखडाता नहीं... SAMAAPT


आपका... आपका ही तो...

विक्की तिवारी...

26 April 2010

Day 8, Home, Jabalpur (M.P.)

तो ऐसा है भैया, के हम आ गए...
आज हमने अपने अपने उस नाटक की प्रूफ रेअडिंग की जिसे मैंने और संदीप भाई ने और लोगों के साथ मिलकर सन २००८ में किया था - कॉल। इस नाटक में ६-७ पात्र थे लेकिन इतने समय में सबकी स्क्रिप्ट गुम हो गयी थी। हाँ, ताज्जुब की बात है - मेरी भी स्क्रिप्ट खो गयी थी... मेरी गलती से नहीं, संदीप भाई की गलती से। लेकिन फिर किसी के पास उसकी xerox कॉपी पड़ी हुई थी। पहले उसको किसी और से टाइप करवाया और फिर उसकी आज दूसरी और तीसरी प्रूफ रेअडिंग थी। और आज ही मैंने इसी नाटक की इंग्लिश वाली स्क्रिप्ट की भी कॉपी करवाई क्योंकि संदीप भाई ने कहा था की जब में लौटूंगा तो पहला production इसी नाटक का होगा।
आज मैंने अपने एक दोस्त से पुछा जो रिहर्सल में आता था की क्या तुमने मेरा ब्लॉग पढ़ा। उसने कहा की शुरू के तीन पढ़े थे उसके बाद बोर हो गया। उसकी इस बात ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया। इसलिए मैंने सोचा की कल से किसी एक विषय को लेकर बात किया करेंगे। इससे मेरा और साथ ही साथ आपका भी बौधिक स्तर बढेगा। संभवतः, एक दो दिनों में TG के registration की कार्यवाही पूरी हो जाएगी। कल फिर से ठाणे जाना है पासपोर्ट के लिए खुद का verification करवाने। आज में पापा के साथ किसी बात पर बहुत हंसा और रिहर्सल में भी दादा और हम और हम सभी किसी बात पर बहुत हँसे थे।
चलने से पहले दो बातें हो जाएँ किसी के बारे में :

"तुमसे मिले न थे तो कोई आरज़ू न थी,
मिले तुमसे तो तेरे तलब्दार हो गए..."

और

" ये दिल वालों की दुनिया है अजब है दास्ताँ इनकी,
किसी से दिल नहीं मिलता, कोई दिल से नहीं मिलता..."

Jai Theatre...