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09 March 2011

Day 33, Office, Jabalpur (M.P.)

ये मेरी एक और नयी कविता है, जो हमने 04 / 03 / 2011 को लिखी थी, ये कविता समर्पित भी है किसी को, ये एक प्रेम कविता है जिसका शीर्षक है - यूँ भी कभी

यूँ भी कभी

अपने घर में
सोफे पर
फुरसत के पलों में
कभी यूँ ही
लेटा रहा करूँगा
तुम्हारी गोद में
सर रखकर
यूँ भी कभी
तुम मेरी आगोश में
आ जाओ
तुम मुझ में
मैं तुम में
हो जाएँ विलीन 
हम दोनों
एक दुसरे में खो जाएँ
यूँ भी कभी
शाम के धुंधलके में
हम मिलें
कुछ इस तरह
कि न रह जाएँ
ज़रा सी भी दूरियां
हमारे बीच
यूँ भी कभी
लहलहाती हरी घास पर
हम चलते चले जाएँ
एक अंतहीन सफ़र पर
यूँ भी कभी
ठण्ड की ठिठुरती शामों में
हम
अपनी गर्म साँसों से
लिखें
एक नयी इबारत प्रेम की
यूँ भी कभी
मैं उछालूं तुम्हें
किसी बच्चे की तरह
तुम्हारी
निर्मल शांत निश्छल हंसी
कि एक झलक पाने
यूँ भी कभी
तुम मुझे
किसी किताब की तरह
रख लो सीने पर
और मैं
तुम्हें समेट लूँ
अपने शब्दों में
कुछ इस तरह
की
तुम
बन जाओ
मेरे
शब्द
और मैं
बन जाऊं
तुम्हारी किताब
शब्द और किताब...
जो बनते हैं
एक दुसरे के लिए
क्योंकि
बिना एक दुसरे के
दोनों के होने का
कोई मतलब नहीं
ठीक हमारी तरह
यूँ भी कभी
हम लेटें
एक साथ
निहारें आकाश को
जो है
तुम्हारी बाहों के घेरे सा विशाल
तुम्हारा एहसास कहता है
मेरे रहो
ये
मुझे अपना बना लो
कभी यूँ भी
जी करता है
की
तुम्हें
अपनी गोद में उठा कर
भीगता रहूँ बारिश में
देर तक
यूँ भी कभी
उम्मीद करता हूँ
की
ये ज़िन्दगी
यूँ ही गुज़र जाए
उसी सोफे पर
तुम्हारी गोद मैं
सर
रखे हुए...

ll विकी तिवारी ll

आपका... आपका ही तो...

विकी तिवारी