मेरी नयी कविता का शीर्षक है - उथल पुथल. इसे मैंने लिखा है १४ मार्च २०११ को :
उथल पुथल
उथल पुथल
मची हुई है
मेरे
मन मस्तिष्क में
पसरा रहता था
जहाँ
सन्नाटा कभी
अब वहां
टूट रहे हैं
अनोखे
अजीब
कुछ अपने
कुछ पराये
विचारों के तूफ़ान
यही तूफ़ान
यही उथल पुथल
है मेर्र परेशानी
का सबब
पता नहीं
ये मन
हमेशा
अतियों को ही
क्यों चुनता है
या तो रहेगा
एकदम अशांत
या फिर
साधा रहेगा
एक लम्बी
भयावह
प्रश्नवाचक
चुप्पी
क्यों नहीं ये
बीच का रास्ता
अपनाता
क्या खोता है ये
मौन धारण करने में
क्या पता है
शोर मचाने में
जाने इसकी नियति क्या है
ये चाहता क्या है
क्या
मन के 'मन' में
सवाल नहीं उठते
कि
क्यों में उठता हूँ
इतने तूफ़ान
क्यों
तेहस नहस
कर डालना चाहता हूँ
इसका
हर सुख चैन
हे मन
मेरे प्यारे मन
कभी तुम महसूस करना
वो बैचैनी
जो तुमने बोई
मेरे अंतस में
कि
मैं अकेला होकर भी
रहता नहीं अकेला
एक पल भी
तुम्हारे सवाल
मेरे अन्दर कोंधते हैं
कुछ देर
क्यों नहीं
तुम चुप बैठते
बताना कभी
सोच कर...
तब तक
रहता हूँ मैं परेशान
जूझता हूँ
तुम्हारे
अनभिग्य
अबूझ
सवालों से
लाता हूँ जवाब
और तब
आदातानुसार
तुम फिर बदल देना
सवाल...
ll विकी तिवारी ll
आपका, आपका ही तो
विकी तिवारी