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25 April 2010

Day 7, Home, Jabalpur (M.P.)

नमस्ते, गुड एवेनिंग, आदाब, सत्श्रीअकाल... यारों सुनाओ कैसे हैं आपके हाल।
आज सन्डे था... घर पर ही रहे दिन भर... सुबह ११:३० पे निकला था ऑफिस और संदीप भाई के काम से फिर जल्दी आ गया था। आज जीजाजी बच्चों को छोड़ गए थे, बच्चे दिन भर धमाचोकड़ी करते रहे। बहुत energy होती है बच्चों में... मेरे भांजे ने मुझे ही एक ठूंसा जड़ दिया... जबड़ा हिल गया था... रिहर्सल गया था लेकिन कोई पहुंचा ही नहीं तो में वापस लौट आया। कोई टाइम पे नहीं पहुंचना चाहता... यदि सब लोग टाइम पे पहुँचने लग जाएँ तो फिर बात ही क्या। आज कोतवाली से फ़ोन आया था मुझे... मैं खुश हो गया। शायद मैं पहला ऐसा इंसान होऊंगा जो ठाणे जाने के नाम पे खुश हो रहा है। दरअसल मुझे वहां से फ़ोन इसलिए आया था की मुझे verification करवाना था अपना पासपोर्ट के लिए... बाकी आज कुछ खास नहीं है कहने को आज के लिए... कल सुबह मुझे दौड़ने भी जाना है... मुझे जो काम कल करने हैं उनकी रूपरेखा भी बना ली है। आज सर ने मिलने को कहा था लेकिन नहीं मिले... बहुत दुष्ट हैं वो। खेर, जाने से पहले किसी को याद करना बहुत ज़रूरी है क्योंकि - मोहब्बत की मोहब्बत है, इबादत की इबादत है, मेरे महबूब की सूरत खुदा से मिलती जुलती है :

"रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ,
आ मुझे फिर तनहा छोड़ जाने के लिए आ..."

और :

"दीवाना हँसता है तो हँसने लेने दो यारों,
वो तन्हाई में बैठ कर रोया भी बहुत है..."

साथ ही :

"संबंधों की पूँजी लेकर हम गए बाज़ार में,
लेकिन दुनिया बहुत तेज़ थी सब कुछ बिका उधार में..."

Jai Theatre...