प्रस्तुत लेख इस बार की 'अहा! ज़िन्दगी' में छपे एक लेख का हिस्सा है, जिसे में आप सबके साथ बांटना चाहता हूँ... विषय है - प्रेम :
'... तब अल्मित्र ने कहा, 'हमसे प्रेम के विषय में कुछ कहो." ... तब उस देवदूत ने अपना मस्तक ऊँचा किया और लोगों पर दृष्टि डाली. सब पर शान्ति छा गयी और गुरु-गंभीर स्वर में उसने कहा - "जब प्रेम तुम्हें अपनी ओर बुलाये तो उसका अनुसरण करो यद्यपि उसकी राहें विकट और विषम हैं, जब उसके पंख तुम्हें ढँक लेना चाहें तो तुम आत्मसमर्पण कर दो, भले ही उन पंखों के नीचे छिपी तलवार तुम्हें घायल करे. और जब वो तुमसे बोले तो उसमें विश्वास रखो, भले ही उसकी आवाज़ तुम्हारे स्वप्नों को चकनाचूर कर डाले. क्योंकि प्रेम जिस तरह तुम्हें मुकुट पहनाएगा, उसी तरह सूली पे भी चढ़ाएगा. जिस तरह वो तुम्हारे विकास के लिए है, उसी तरह तुम्हारी काट-छांट के लिए भी. अनाज की बालियों की तरह प्रेम तुम्हें अन्दर भर लेता है. तुम्हें नंगा करने के लिए कूटता है. तुम्हारी भूसी दूर करने के लिए तुम्हें फटकता है. तुम्हें पीस कर श्वेत बनाता है. तुम्हें नरम बनाने गूंथता है. और तब तुम्हें अपनी पवित्र अग्नि पर सेंकता है, जिससे तुम प्रभु के पवन थाल की पवित्र रोटी बन सको... - खलील जिब्रान
प्रेम की भावना को इस सतर्क दृष्टि से जीना कि वो अंतत: सुखद होगी या दुखद, प्रेम है ही नहीं. जैसा की पहले कहा गया, प्रेम में सब कुछ समर्पित कर देना ही सब कुछ पाना है. एक उन्मुक्त नदी की तरह हरहराती ये भावना अंतत: एक गंभीर और व्यापक समुद्र बनेगी. बस, सुखद या दुखद जैसा कुछ नहीं...
प्रेम इतना शक्तिशाली होता है कि देह को चीरता हुआ आत्मा के तहखाने तक जा पैठता है. देह तो उसको उस तहखाने तक पहुंचाने में सिर्फ पुल का काम करती है. अगर प्रेम देह में ही गुम्फित हो होकर रह जाए तो उसे प्रेम कि संज्ञा नहीं दी जा सकती, क्योंकि बाज़ारों में भी देह में डूबने के लिए देह तो मिल ही जाती है...
आपका, आपका ही तो...
Vicky Tiwari
विकी भाई... आपसे परिचय पाकर मुझे बेहद ख़ुशी हुई... आपका चिट्टा काफी आकर्षक है... शुभकामनाएं...
ReplyDeleteसाभार
रामकृष्ण गौतम
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