~ Happy Propose Day Doston ~
ग्लोबल प्रेम तीन मिनिट
ग्लोबल समय में 'प्रेम' कि जगह 'सेक्स' ने ले ली है. इसी कारण 'प्रेम' परेशान है. प्रेम का फ्रेम सेक्सी हो चला है. नए-नए ग्लोबल वातावरण ने प्रेम कि कुंडली को बिगड़ दिया है. उसकी पहचान को प्रदूषित कर दिया है.
प्रेम अब घिसा-पिता पुराना दकियानूसी कुछ गंवई सा शब्द लगता है. कुछ समय पहले तक प्रेम एक 'क्रिटिकल' पद हुआ करता था कि 'प्रेम' हर किसी के बस का नहीं है. उसकी शर्तें कठोर हैं. वो एक 'चुनौती' है. जैसा कि जिगर मुरादाबादी ने कहा -
ये इश्क नहीं आसां बस इतना समझ लीजे
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है...
कितना कठिन !
कितना चुनौती भरा !
प्रेमीजन 'कुछ कहते हुए भी' डरते हैं, क्योंकि प्रेम समाज में अपराध बराबर है. इस प्रेम का दुश्मन सारा समाज है. और प्रेम एक ऐसा बावला अनुभव है जो इस सबके बावजूद किया जाता है. वो तब भी होता जब समाज उसे करने कि आज्ञा नहीं देता. प्रेम 'प्रोटेस्ट' कि तरह है. इस क्लासिकल प्रेम में 'सेक्स' का बखान नहीं होता. क्लासिकल प्रेम कि यात्रा इस सूत्र कि तरह होती है - 'प्रेम - शादी - सुहागरात - बच्चे - सुखी - ग्रहस्ती' यानी छोटा परिवार सुखी परिवार. यही उसकी सामाजिकता है. वो पवित्र सामाजिक बंधन है. पवित्र रस्म है. मंगलमय है एवं पवित्र संबंध कारक है. क्लासिकल प्रेम 'लाइट' में होता था, लेकिन लाइट जाने के बाद आगे क्या होता था वो सब कुछ सचित्र कोकशास्त्र कि पीली जिल्द वाली किताबों में मिलता था जिन्हें adult होने पर ही देखा, पढ़ा जा सकता था. प्रेम तब 'ए' certificate लिए रहता था. ये पुराने स्टाइल का सिर्फ समझदारों, वयस्कों के लिए reserved प्रेम था, जिससे कई पीढ़ियों ने प्रेम करना सीखा. 'थोडा सा रूमानी हो जाएँ' होना सीखा. प्रेम गीत गाना सीखा. मरना जीना सीखा.
एक परिवर्तन साफ़ दिखलाई पड़ता है. अब बेहद अमीर की लड़की बेहद गरीब लड़के से प्रेम करने की गलती करती नज़र नहीं आती. ये दिन नयी middle क्लास के नए प्रेम के दिन हैं. अब अमीर लड़के/लड़कियों का गरीब लड़कियों/लड़कों से प्रेम अधिक नज़र नहीं आता. ये प्रेम अपने वर्ग में ही होता रहता है, वर्ग बाहर नहीं होता.
अब प्रेम का मतलब सेक्स है. ग्लोबल दुनिया कि दुर्निवारता ये है कि प्रेम अब नितांत 'लौकिक' और 'फिजिकल' नज़र आता है. प्रेम का मूल काम है. कामना है. फ्रायड का 'लिबिडो' है. इस रास्ते प्रेम सेक्स है.
अब प्रेम परिवार तक नहीं पहुँचता. प्रेम अब एक स्थाई अमर मूल्य न होकर तदर्थ एडहोक मूल्य है, जिसमें प्रेम की मात्रा कितनी है और सेक्स कि मात्रा कितनी ? ये पता लगाना मुश्किल है. प्रेम अब भी अनमोल है, क्योंकि अब वो जीवन से 'खो गया' है.
- सुधीश पचौरी
आपका, आपका ही तो
Vicky Tiwari

bohot achcha post hai....magar is post mein bhi prem ko seemit darshaya gaya hai....prem anmol to hai, magar beyond limitations...human being have made certain rules and regulations for their disciplined existence...magar prem ko in rules aur regulations k andar bhi napa nahi ja sakta..prem aseem hai..alaukik anubhav...shaadi k dayre se bhi upar.sex bhi do prakar k hote hai...1 jo totally physical hota hai aur doosara jo alaukik hai...bas zaroorat hai to inke prakritik uddeshya aur prem mein shoonya k astitva ko janane ki.
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