09 February 2011

Day 29, Home, Jabalpur (M.P.)

~ Happy Chocolate Day Doston ~
दोस्तों, आज के आर्टिकल में शायद आप में से अधिकतर लोगों को अपने सवालों का जवाब मिल सकता है, इसे जब हमने पढ़ा तब तो मुझे ऐसा ही लगा...
क्यों होता है प्यार बार-बार 
फिर-फिर प्रेम गली का फेरा
दरवाज़े पर फिर कोई दस्तक हुई. अनमने मन से दरवाज़ा खोला तो फिर से भीग गया तन मन. प्रेम की बौछारों ने फिर से सराबोर कर दिया सर से पाँव तक. एक बार फिर ज़िन्दगी में आया प्यार. मन से उठा एक ही सवाल की क्यों होता है प्यार बार-बार... न कोई आवाज़, न हरारत, न जुम्बिश कोई. ऐसे ही चुपचाप एक रोज़, एक रिश्ते ने दम तोड़ दिया था. ढेर सारे खिलते हुए हरसिंगार के बीच अपने मन का हर कोना महकाने वाला प्रेम, जीवन के हर मोड़ पर साथ निभाने का वादा करने वाला प्रेम, एक साँस भी एक-दूसरे के बगैर न ले पाने वाला प्रेम. कब कैसे अचानक बेमानी हो गया.
सिकुड़ गया वादों का आसमान
हरसिंगार अब भी वैसे ही धरती को अपनी सुगंध और फूलों की चादर भर रहे थे, लेकिन ये खुशबू किसी के मन के कोनो को नहीं भर रही थी. सात जन्मों के वादों का आसमान अचानक सिकुड़ गया. दिल फिर अकेला हो गया. दुरुख, पीढ़ा, अवसाद, जुदाई, विरह, धोका, विरक्ति न जाने कितने ही शब्दों का जंगले उग आया आसपास. नहीं... प्रेम जैसे कोई चीज़ होती ही नहीं. प्रेम की बातें, झूठी बातें... यही लगने लगता है अचानक. उफ्फ्फ! कितनी पीढ़ा. दुनिया भर के साहित्य के न जाने कितने पन्ने असफल प्रेम के फलसफों से भर गए. असफल प्रेम... कितना विचित्र शब्द है ये. क्या सचमुच कोई प्रेम असफल होता है. क्या होता है सफल होना ? कब कोई प्रेम सफल है और कब असफल ये कैसे तय होगा ? कौन तय करेगा ?
प्रेम गली अति सांकरी
प्रेम की गली में एक अजीब सा खिचाव है. ये जानते हुए की इसकी डगर बड़ी पथरीली है, जोखिम भरी है फिर भी मन उसी ओर भागता है. बार-बार दिल टूटता है, फिर भी नए सिरे से प्रेम को अपनाने में ज़रा भी हिचक नहीं होती. एक ही जीवन में कितनी बार प्यार दस्तक दे सकता है. कितनी बार होता है प्यार... आखिर क्या खोजते है हम प्यार के नाम पर इसकी तलाश में भटकते रहते हैं उम्र भर ? इन सवालों के जवाब सदियों से हर कोई ढूंढ़ रहा है. मन बावरा होकर सडकों पर भटकने लगता है. वो कहते हैं न इश्क नचाये जिसको यार, वो फिर नाचे बीच बाज़ार. निराशा के गहनतम अंधेरों में भी प्रेम का दिया टिमटिमाता रहता है हमेशा.
धीम ताना ना ना ना... फिर एक बार
मन ही नहीं समूची प्रकृति नाच उठी. कितनी सुन्दर हो गयी धरती, कितनी सुरीली हो उठी हवाएं. अबकी जबकि प्रेम ने कंधे पर रखा हाथ, तो भर गए सारे पिछले घाव भी. ऐसा लगा मानो मरी हुई देह को साँसों ने छू लिया हो. इतना सुन्दर संसार तो पहले कभी लगा ही नहीं था की ज़िन्दगी इतनी खूबसूरत भी हो सकती है. हर रोज़ प्रेम के गहराते रंग ज़िन्दगी के रंगों से रु-बा-रु करा रहे थे.
कहीं से कोई सदा नहीं आई
तुम आये तो पहली बार लगा ज़िन्दगी जीने को दिल किया... कहीं से कोई आवाज़ आई. लगा की अब तक जिसे प्रेम समझते रहे वो असल में प्रेम था ही नहीं. जिसके पीछे अनजाने चल पड़े थे कदम वो तो बस प्रेम की छवि थी. इलुजन. चाँद क़दमों के साथ में वो इलुजन भी ख़त्म हुआ. और इलज़ाम आया प्रेम के सर. उसे मिला धोखे का नाम. प्रेम सिर्फ प्रेम होता है. टूटने, बिखरने की पीढ़ा, धोखे का दर्द, दुरुख इन सबसे इतर वो जब होता है तो बस होता है. आप चाहें ना चाहें वो आपके साथ हो ही लेता है. बिना आपसे पूछे आपकी ज़िन्दगी का हिस्सा बन बैठता है. हमारी शक्सियत हमसे ही अनजानी हो ही जाती है. बस शर्त इतनी सी है की प्रेम सचमुच हो.
टूटती गयी प्रेम की डोर
साथी, जो साथ ना हो, तो भी उसके साथ का एहसास रहे. पसंद-नापसंद के अनुलोम-विलोम बहुत पीछे कहीं छूट जाएँ. ऐसा ही तो होता है प्रेम. एक दिन फिर ना कहीं से कोई आवाज़ आई, ना कोई शोर हुआ, बस पलकों पर कुछ बूँदें सजी और दुनिया थम गयी. लेकिन सचमुच सब कुछ ख़त्म हो गया. कैसे ख़त्म हो गया पता भी नहीं चला. ये क्या सिलसिला है ? ये कैसा प्रेम है ? क्या होता है प्रेम की जिसके आते ही दुनिया मुकुराने लगती है और जिसके जाते ही कायनात थम जाती है. फिर जीवन में प्रेम दस्तक देता है, फिर कहीं कुछ दरक जाता है. फिर मिलना, फिर बिछड़ना, फिर जुड़ना, फिर टूटना... प्रेम एक शाश्वत तलाश के रूप में लगातार जीवन में उपस्तिथ और अनुपस्तिथ होता रहता है.
दास्ताँ-ए-इश्क
प्रेम क्या होता है, और सफल प्रेम के मायने क्या है, ये दोनों बड़े सवाल हैं. सफल प्रेम का अर्थ विवाह होना है क्या ? तो प्रेम विवाह के बाद भी क्यों जारी रहती है प्रेम की खोज ? कहते हैं की मोहब्बत में मिलने-बिछड़ने  का कोई अर्थ नहीं होता. अमृता-इमरोज़ इसकी बड़ी मिसाल हैं. वो साहिर पे मरती रहीं और इमरोज़ उन पर. प्रेम की लौ को दिल के भीतर एक बार जला लेना और उसकी आंच में पूरे जीवन को सेंकते रहना. हर साँस महबूब का नाम. हर लम्हा उसी की इबादत.
कोई बेवफा नहीं होता
जो प्रेम इबादत बन जाता है वो कैसे एकदम से ख़त्म हो जाता है एक दिन ? कैसे टूट जाता है दिल ? कैसे असफल हो जाता है कोई प्रेम ? क्या कोई प्रेम असफल हो सकता है ? प्रेमी का ना मिलना ना मिलना तो सफलता का मीटर नहीं है. फिर किसे कहते हैं असफल होना ? दुनिया जिसे असफल प्रेम कहती है वो तो प्रेमी का नाम इतना ही है लेकिन जहाँ प्रेमी मिल जाए, वहां भी जब प्रेम की असफलता की कहानियां लिखी जा रही हों तो क्या कहा जायेगा ? जो टूटता है वो प्रेम का भ्रम होता है. टूटते सिर्फ प्रेम के भ्रम हैं, प्रेम कभी नहीं टूटता, कभी असफल नहीं होता. फिर क्यों हमें  भ्रम के टूटने पर इतना दुखी होते हैं. क्यों ना चल पड़ें प्रेम की तलाश में. दूसरी बार... तीसरी बार... चौथी... पांचवी बार, क्योंकि तलाश तो शाश्वत है, लेकिन सच ये भी है की अगर सच्चे प्रेम की एक बूँद ने भी कभी दमन में पनाह ली तो सारी उम्र उस एक बूँद की नमी में भीगे भीगे ही गुज़र जायेगी. उसके बाद किसी की तलाश की कोई गुंजाईश ही नहीं बचेगी. सचमुच नहीं.
प्यार आखिर कितनी बार
लोग कहते हैं इंसान जीवन में दो बार प्यार करता है. एक बार तब जब वो जवानी की देहलीज़ पर पाँव रखता है. कच्ची उम्र का मासूम प्रेम. ना कोई स्वार्थ, ना हिसाब किताब, ना आगा पीछा सोचने का समय. बस एक दूसरे का हाथ पकड़ पूरी धरती को अपने क़दमों से नापने का ख्वाब. आमतौर पे ये मासूम प्रेम ज़िन्दगी की राह में पीछे छूट जाता है. फिर आती है दूसरे प्यार की बारी. अब दिल को वो अच्छा लगता है जो दिमाग को भी भाता है. वैचारिक तालमेल, अच्छा-बुरा, व्यक्ति, व्यक्तित्व और भी ना जाने क्या. हो सकता है दूसरे प्रेम में भी ये सब कुछ ना हो, लेकिन परिपक्वता तो होती ही है. लेकिन जब ये प्रेम भी दरकने लगता है तो मन की उदासियाँ अमावास की रातों को भी मात देने लगती है. तब सवाल उठता है की आखिर क्या है जिसके खोज में मन फिर-फिर प्रेम की डगर पर दौड़ने को व्याकुल रहता है. हर बार यही आस की शायद इस बार मिलेगा सच्चा प्रेम.
तेरे इश्क की एक बूँद
सच्चा प्रेम... इसी की तलाश में मन जिंदगी भर भटकता फिरता है. इसी की तलाश में प्यार के नाम पर ठगे जाते हैं हम बार-बार. सच्चे प्रेम की चाह उम्र भर मन के किसी कोने में दबी रहती है. हम हमेशा चाहते हैं की सच्चे प्रेम की एक अनुभूति हमें एक बार तो छू ले... चाहे फिर बर्बाद ही क्यों ना हो जाये जीवन. कोई मिले तो जिसके नाम का सजदा करते हुए उम्र बीत जाए. जब बात प्रेम की हो तो इसमें शादी, ब्याह, मान मर्यादा, रीति रिवाज़, परमपराएं ये सब कुछ मायने नहीं रखता. प्रेम तो हमेशा से इन सारे अल्फाजों से बहुत ऊपर रहा है, रहेगा.
- स्वस्ति प्रभा

आपका, आपका ही तो
Vicky Tiwari

No comments:

Post a Comment