ये मेरी एक नयी कविता है, जो हमने आज (02 / 03 / 2011) ही लिखी है, ये कविता समर्पित भी है किसी को, ये एक प्रेम कविता है जिसका शीर्षक है -
तुम मैं... मैं तुम :
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तुम मैं... मैं तुम
तुम मैं
मैं तुम
हुए
एक दुसरे में
गुम
किसी
फ़रिश्ते
की तरह
तुमने लिया
मेरा हाथ
अपने
हाथों में
मैं मुस्काया
किन्तु
मेरा हाथ
ढीला
ही रहा
कुछ पलों की
दूरी के बाद
मैंने भी
पकड़ा फिर
हाथ तुम्हारा
मैं फिर मुस्काया
ये भूलकर
की
कुछ देर पहले ही
किसी और से
बात
करते रहने पर
तुमने
कुछ फेंका था मुझ पर
ये कह कर
कि
इतने दिनों बाद
मिले हो
तब भी
किसी और से ही
बात कर रहे हो
लेकिन
तुम
भूल गयीं
कि
हम
बहुत दिनों बाद नहीं
सिर्फ
दो ही दिन
बाद तो मिले थे
और
सच बताऊँ
मुझे भी ऐसा ही लगा
कि
हम दो दिनों बाद नहीं
बहुत दिनों बाद मिले हैं
तब समझ आया
उस बात का मतलब
की
"हम जिससे मिलते हैं
वैसे हो जाते हैं
पानी में
हर रंग
मिलाया जा सकता है"
इसी तरह
पानी में मिले
रंग को
एक दूसरे से
अलग
नहीं किया जा सकता
ठीक वैसे ही
जैसे हम दोनों
जो हैं
एक दूसरे में
गुम
पानी में पानी की तरह
आ
हम
एक दूसरे में
घुल के सो जाएँ
हो जाएँ
फिर एक बार
एक दूसरे में
गुम...
II विकी तिवारी II
आपका, आपका ही तो
विकी तिवारी
डियर विकी जी,
ReplyDeleteमैंने "तुम मैं... मैं तुम" पढ़ा, बहुत अच्छा लिखा है आपने| सच कहूं तो इन पंक्तियों के माध्यम से एक सुपरहिट फिल्म चला दी आपने...
साभार
रामकृष्ण