दोस्तों, मेरी अगली प्रेम कविता का शीर्षक है : ये श्याम कहाँ जाए...
ये श्याम कहाँ जाए...
अब के बरस की
ये श्याम कहाँ जाए...
होली में
हुआ कुछ
अजब
अनोखा
घटी
एक अनहोनी
इस बार
राधा नहीं
बल्कि
रुक्मणि
के बिन
था
श्याम अधूरा
हाँ...
राधा कृष्ण
तो हैं ही
एक दूसरे के पूरक
एक सिक्के के दो पहलु
राधा को कृष्ण कहो
या
कृष्ण को राधा
दोनों को
किया ही नहीं जा सकता
अलग
किन्तु
यदि
सब हैं कृष्ण के
कृष्ण हैं सबके
तो कृष्ण भी था
इस बार
अपनी रुक्मणि
बिन अधूरा
और
रुक्मणि भी थी
अपने श्याम
बिन अधूरी
नटखट श्याम की
अजब अनोखी
शरारत के कारण
रुक्मणि है
दूर जा बैठी
उसके बिन
श्याम
यहाँ वहां
हर जगह
कर रहा
पूछ गूछ
कहाँ है
मेरी प्राण प्रिये
रुक्मणि
बोलो न
तुम बिन
ये श्याम कहाँ जाए...
ll विकी तिवारी ll
तुम्हारा, तुम्हारा ही तो
विकी तिवारी
wow what a poem...nice one
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