दोस्तों, कल यानी ११ तारिख को मैं रात को ठीक से सो नहीं पाया... करवटों पे करवटें बदलता रहा और आज सुबह उठा तो मेरे हाथों ने एक कविता रच डाली मेरे रात की बेचैनी पर... पता नहीं और कितने कविताएँ पोशीदा हैं मेरे जागने मैं... खेर, प्रस्तुत है मेरी एक नयी प्रेम कविता जिसे हमने आज ही लिख है, शीर्षक है - छटपटाहट :
छटपटाहट
कल
रात भर
तुम्हारा नाम लेकर
छटपटाता रहा
अपने बिस्तर पर
हाँ...
वही बिस्तर
जहाँ
मैं
और
तुम्हारा
मानस रूप
स्वरुप
हुआ करता था कभी
पर आज
पता नहीं क्यों
एक
अजीब सा
ख़ालीपन है
तुम्हारे बगैर
तुम
साथ नहीं हो
और
न ही है
तुम्हारा
मानस रूप
वो स्वरुप
आज
मेरी
बाहों का वो
अप्रत्याशित
अकल्पनीय
खालीपन
तुम्हारे सिवा
और कौन
भर सकता है ?
बोलो न...
कौन वो जगह
भर सकता है ?
कभी
तुम भी तो
महसूस करो
वो तड़प
वो छटपटाहट
जो
मैं
महसूस कर रहा हूँ
तुम्हारे लिए
हर घडी
हर पल
पर...
खैर...
रहने दो...
जाने दो...
मत महसूस करना
तुम
वो दर्द
जो
मेरे दिल मैं
तुम्हारे लिए है
क्योंकि
अपना दर्द तो मैं
सह सकता हूँ
तुम्हारे साथ न होने
के दर्द को भी
सह सकता हूँ
पर
नहीं सह सकता
कि
ये दर्द तुम्हें हो
ये मेरे लिए
किसी विभीषिका*
से कम न होगा
तुम्हारे जाने का दर्द
वो गम
इस बात
के आगे
कुछ भी नहीं
की
तुम्हें हुआ
ज़रा सा दर्द
तिल भर की चुभन भी
मेरे लिए
किसी
त्रासदी
से कम नहीं...
प्राकृतिक त्रासदी
तो
रोकी भी नहीं जा सकती
लेकिन
'ये त्रासदी'
की 'प्रकृति'
केवल
हम दोनों मिलकर ही
रोक सकते हैं
आओ,
इस हादसे को
और त्रासद रूप
लेने से रोकें...
रोको इस छटपटाहट को
जो साथ लिए जा रही है
मुझे
एक अंतहीन सफ़र पर
जहाँ से लौट पाना मुमकिन नहीं
लेकिन
ये सफ़र भी
क्या मुझे
तुम्हारे बिना ही
तय करना है ?
नहीं...
नहीं कर सकता
मैं ये सफ़र
तुम्हारे बगैर
न
तुम्हारे संग
चुनांचे
गर मैं गया
तो
दर्द कहीं और होगा...
तुम्हें... हाँ, तुम्हें...
और
फिर वही
चिर परिचित
विभीषिका
घटित होगी
एक बात बोलूं...
तुम्हीं
मुझे
इस चक्रक दोष* से
आज़ाद
कर सकती हो
आओ,
साथ मेरे
हम रचें
बिना छटपटाहट
एक नया इतिहास...
ll विकी तिवारी ll
विभीषिका : त्रासदी, बड़ा हादसा
चक्रक दोष : cyclic fallacy
तुम्हारा, तुम्हारा ही तो
विकी तिवारी
