26 April 2010

Day 8, Home, Jabalpur (M.P.)

तो ऐसा है भैया, के हम आ गए...
आज हमने अपने अपने उस नाटक की प्रूफ रेअडिंग की जिसे मैंने और संदीप भाई ने और लोगों के साथ मिलकर सन २००८ में किया था - कॉल। इस नाटक में ६-७ पात्र थे लेकिन इतने समय में सबकी स्क्रिप्ट गुम हो गयी थी। हाँ, ताज्जुब की बात है - मेरी भी स्क्रिप्ट खो गयी थी... मेरी गलती से नहीं, संदीप भाई की गलती से। लेकिन फिर किसी के पास उसकी xerox कॉपी पड़ी हुई थी। पहले उसको किसी और से टाइप करवाया और फिर उसकी आज दूसरी और तीसरी प्रूफ रेअडिंग थी। और आज ही मैंने इसी नाटक की इंग्लिश वाली स्क्रिप्ट की भी कॉपी करवाई क्योंकि संदीप भाई ने कहा था की जब में लौटूंगा तो पहला production इसी नाटक का होगा।
आज मैंने अपने एक दोस्त से पुछा जो रिहर्सल में आता था की क्या तुमने मेरा ब्लॉग पढ़ा। उसने कहा की शुरू के तीन पढ़े थे उसके बाद बोर हो गया। उसकी इस बात ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया। इसलिए मैंने सोचा की कल से किसी एक विषय को लेकर बात किया करेंगे। इससे मेरा और साथ ही साथ आपका भी बौधिक स्तर बढेगा। संभवतः, एक दो दिनों में TG के registration की कार्यवाही पूरी हो जाएगी। कल फिर से ठाणे जाना है पासपोर्ट के लिए खुद का verification करवाने। आज में पापा के साथ किसी बात पर बहुत हंसा और रिहर्सल में भी दादा और हम और हम सभी किसी बात पर बहुत हँसे थे।
चलने से पहले दो बातें हो जाएँ किसी के बारे में :

"तुमसे मिले थे तो कोई आरज़ू थी,
मिले तुमसे तो तेरे तलब्दार हो गए..."

और

" ये दिल वालों की दुनिया है अजब है दास्ताँ इनकी,
किसी से दिल नहीं मिलता, कोई दिल से नहीं मिलता..."

Jai Theatre...

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